सांवलिया सेठ का इतिहास

श्री सांवलिया जी की प्रतिमाओं का प्राकट्य
भगवान श्रीकृष्ण के सांवलिया स्वरूप को भक्तजन सांवलिया सेठ के नाम से श्रद्धापूर्वक जानते हैं। सन् 1840 में उदयपुर से चित्तौड़ जाने वाली कच्ची सड़क के निर्माण के दौरान बागुंड गाँव में बबूल का पेड़ हटाने पर धरती के नीचे से भगवान श्रीकृष्ण की तीन प्रतिमाएँ प्रकट हुईं।
किवदंती के अनुसार इन प्रतिमाओं को आक्रमणकारियों के समय सुरक्षित रखने के लिए भूमि में छिपाया गया था। प्रतिमाओं की देखरेख पुराजी भगत के निर्देशन में की गई। एक प्रतिमा भादसोड़ा और दूसरी मंडफिया ले जाई गई; मूल प्राकट्य स्थल पर भी मंदिर बना।
प्राकट्य स्थल मंदिर का निर्माण
सन् 1961 में श्री मोतीलालजी मेहता और सहयोगियों ने मंदिर निर्माण व विस्तार का कार्य शुरू किया। श्रद्धालुओं ने सामग्री, श्रम और सहयोग देकर निर्माण में भाग लिया। सन् 1978 में मंदिर पर ध्वजारोहण हुआ। मंदिर का निर्माण और सौंदर्यीकरण आगे भी जारी रहा।
देवझूलनी एकादशी मेला
भाद्रपद शुक्ल दशमी, एकादशी और द्वादशी को तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता है। एकादशी पर भादसोड़ा और बागुंड से भगवान के बाल स्वरूप की शोभायात्राएँ निकलती हैं और प्राकट्य स्थल पर मिलती हैं।
हर महीने कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को भंडार खोला जाता है और अमावस्या की शाम महाप्रसाद का वितरण होता है।
